आशु भटनागर। ग्रेटर नोएडा के इंडिया एक्सपो सेंटर में 14 से 16 मई तक ‘भारत शिक्षा एक्सपो’ का तीसरा संस्करण आयोजित किया जा रहा है। प्रशासन का दावा है कि 12वीं के बोर्ड परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद हो रहा यह कार्यक्रम लाखों विद्यार्थियों को अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक – सही कोर्स, कॉलेज और करियर के चयन – की जानकारी लेने में आसानी प्रदान करेगा।
पर क्या यह दावा ज़मीनी हकीकत से मेल खाता है? शिक्षा एक्सपो के उद्देश्यों पर चर्चा से पहले हमें यह समझना आवश्यक है कि यह शिक्षा एक्सपो अप्रैल में होने जा रहा था। गौतम बुद्ध नगर में हुए हिंसक मजदूर आंदोलन और उसके बाद के घटनाक्रमों के चलते इसे एक महीने के लिए आगे बढ़ा दिया गया। इस देरी ने आयोजक और प्रशासन के बीच समन्वय पर सवाल खड़े किए हैं, लेकिन मुख्य प्रश्न यह है कि अपने तीसरे वर्ष में प्रवेश कर रहा भारत शिक्षा एक्सपो क्या सिर्फ इंडिया एक्सपो सेंटर एंड मार्ट के लिए एक सामान्य मेलों की तरह एक अन्य मेला है, जिसमें सरकार के साथ मिलकर आम लोगों की भावनाओं का दोहन करने का प्रयास किया जा रहा है?
निजी विश्वविद्यालयों की ‘मजबूरी’ या स्वेच्छा?
हमेशा की तरह इस शिक्षा एक्सपो के दौरान जिले के सभी बड़े निजी विश्वविद्यालयों को इसमें शामिल करने के दावे किए जा रहे हैं। यद्यपि ये विश्वविद्यालय अपनी मर्जी से इसमें शामिल हो रहे हैं या फिर यह एक मजबूरी भर है, यह एक अलग प्रश्न है। अक्सर ऐसे आयोजनों में निजी संस्थानों पर दबाव की खबरें आती रही हैं।
फिर भी, सबसे अहम सवाल वही बना हुआ है कि एक्सपो में भाग लेने वाले विद्यार्थी और अभिभावक आखिर इस एक्सपो से क्या प्राप्त करेंगे? क्या उन्हें वाकई कोई निष्पक्ष और उपयोगी जानकारी मिलेगी, या फिर यह निजी संस्थानों के लिए अपनी मार्केटिंग का एक और मंच भर होगा? जिसमे छात्रों और अभिभावकों को अपनी क्षमता के अनुसार बस कालेज का चयन करना है। क्या कोई कालेज यहाँ के हॉस्टल में होने वाली समस्याओ का सच बता पायेगा ? क्या अभिभावक सरकार की और से इन कालेज की सही रेटिंग जान पायेंगे ?क्या इसमें क्षेत्र के सरकारी कालेज भी शामिल होंगे ? क्या मेला आयोजक छात्रों और अभिभावकों को बताएँगे कि जिले में वो कितने सरकारी कालेज में एडमिशन ले सकता है और उनमे क्या क्या कोर्स उपलब्ध हैं ?

चकाचौंध भरे सत्र बनाम जमीनी हकीकत
दावा है कि भारत शिक्षा एक्सपो 2026 का एक प्रमुख आकर्षण इसका समृद्ध सम्मेलन कार्यक्रम होगा, जिसमें विशेषज्ञों द्वारा ज्ञानवर्धक सत्र, पैनल चर्चाएँ, मास्टरक्लास, क्विज, क्रिएथॉन, हैकाथॉन, लॉन्चायॉन, एग्रीथॉन, आइडियाथॉन, कोडथॉन, स्पेसटेक और विशेष प्रस्तुतियाँ आयोजित की जाएँगी। प्रमुख सत्रों में “Join IIT Madras Without JEE”, “NEP 2020 in Action”, “AI Advantage for Personalized Learning in Education” तथा “Shaping the Future of Learning: Bridging Indian Education with Global Opportunities” जैसे आकर्षक विषय शामिल हैं।
ये सत्र निश्चित रूप से आकर्षक लगते हैं, लेकिन क्या तीन दिनों के एक मेले में इतनी जटिल और जीवन-बदलने वाली जानकारी को प्रभावी ढंग से संप्रेषित किया जा सकता है, यह विचारणीय है। क्या एक छात्र या अभिभावक इन सत्रों से निकली जानकारी का विश्लेषण कर अपने लिए सर्वोत्तम निर्णय ले पाएगा, जबकि उन्हें अक्सर विशेष मार्गदर्शन और परामर्श की आवश्यकता होती है?
शिक्षा को ‘मेला’ बनाने की प्रवृत्ति पर सवाल
एक्सपो के तृतीय वर्ष में तीसरे सीजन के लिए इंडिया एक्सपोजिशन मार्ट लिमिटेड (IEML) के सीईओ संदीप सरकार ने दावा किया कि सही कोर्स और संस्थान का चयन किसी भी विद्यार्थी के शैक्षिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय होता है। उनकी इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता, लेकिन क्या सिर्फ एक एक्सपो में आकर विद्यार्थी को यह महत्वपूर्ण निर्णय लेने में वाकई मदद मिल पाएगी? बीते दो एक्सपो से ऐसा अनुभव तो नहीं हुआ है।
प्रश्न वही है कि क्या हम शिक्षा व्यवस्था को मेलों और व्यापार में बदल रहे हैं, या बच्चों और उनके अभिभावकों के लिए कोई दीर्घकालिक उपयोगी जानकारियां भी दे रहे हैं? अभी तक के अनुभवों से यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि ऐसे आयोजन छात्रों के लिए वास्तव में कितने उपयोगी सिद्ध हुए हैं।
ऐसे में यह डर बना हुआ है कि यह आयोजन भी हमेशा की तरह सिर्फ आयोजकों के लिए फायदे का सौदा भर बनकर रह जाएगा, जबकि छात्रों और अभिभावकों के हाथ निराशा ही लगेगी। निवासियों के तौर पर, हमें यह पूछने का अधिकार है कि क्या सरकार और आयोजक इस ‘शिक्षा मेले’ के माध्यम से वाकई शिक्षा के उद्देश्यों को पूरा कर रहे हैं, या सिर्फ एक चमकदार इवेंट का आयोजन कर रहे हैं जिसका उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना भर है।


