आशु भटनागर। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में बड़े बदलाव की सुगबुगाहट तेज हो गई है। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के दिल्ली दौरे के बाद लखनऊ वापसी के साथ ही नई कार्यकारिणी के ऐलान की अटकलें अपने चरम पर हैं। इस बार चर्चा का केंद्र ‘पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्षेत्रीय अध्यक्ष’ का पद है, जिसकी नियुक्ति मात्र एक संगठनात्मक प्रक्रिया नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनावों की दिशा तय करने वाला एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है।
जाट और गुर्जर समीकरणों में आया बदलाव
सियासी गलियारों में चर्चा यह है कि इस बार पारंपरिक माने जाने वाले जाट और गुर्जर समुदाय के दावेदारों की स्थिति पहले की तुलना में कमजोर हुई है। इसके पीछे सरकार और संगठन के बीच ‘संतुलन का सिद्धांत’ मुख्य वजह बताया जा रहा है। मेरठ दक्षिण से विधायक डॉ. सोमेंद्र तोमर को राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के रूप में मिली पदोन्नति ने गुर्जर कोटे की प्रबल दावेदारी को सरकार में पर्याप्त प्रतिनिधित्व के तर्क से सीमित कर दिया है।
इसी प्रकार, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी का जाट समाज से आना और उन्हें मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त होना, इस बात का संकेत है कि पार्टी अब क्षेत्रीय अध्यक्ष पद पर किसी अन्य सामाजिक समीकरण को अवसर दे सकती है।
फॉरवर्ड कास्ट पर दांव की प्रबल संभावना
वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए वैश्य, ब्राह्मण और राजपूत चेहरों का दावा सबसे मजबूत नजर आ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो बीजेपी इस बार ‘बैलेंसिंग एक्ट’ पर पूरा ध्यान केंद्रित कर रही है:

वैश्य कार्ड: मेरठ के व्यापारियों की हालिया नाराजगी और बाजार से जुड़े मुद्दों के मद्देनजर, बीजेपी वैश्य समाज को साधकर उन्हें एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर सकती है।
ब्राह्मण चेहरा: पार्टी के संगठनात्मक संतुलन के लिहाज से ब्राह्मण समाज को साथ लेकर चलना हमेशा से बीजेपी की प्राथमिकता रहा है, जो इस बार भी प्रभावी साबित हो सकता है।
राजपूत समाज: यद्यपि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के रूप में पार्टी के पास एक विशाल राजपूत चेहरा पहले से मौजूद है, फिर भी संगठन में नई ऊर्जा और संतुलन के लिए पार्टी किसी अप्रत्याशित नाम पर मुहर लगा सकती है।
अंतिम मुहर का इंतजार इस नियुक्ति की प्रक्रिया में ‘दिल्ली’ (केंद्रीय नेतृत्व) और ‘लखनऊ’ (संगठनात्मक नेतृत्व) के बीच समन्वय सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। सूत्रों का कहना है कि नाम पर सहमति लगभग बन चुकी है, बस आधिकारिक घोषणा का समय बाकी है। यह फैसला केवल एक पदाधिकारी का चुनाव नहीं, बल्कि यह तय करेगा कि 2027 की चुनावी बिसात पर भारतीय जनता पार्टी किस सामाजिक धुरी को आधार बनाकर ‘मिशन वेस्ट यूपी’ फतह करने का इरादा रखती है।
अगले कुछ घंटों में होने वाली यह घोषणा न केवल बीजेपी के आंतरिक समीकरणों को स्पष्ट करेगी, बल्कि यह भी तय करेगी कि पार्टी आने वाले समय में किस वर्ग को ‘पावर सेंटर’ के करीब लाना चाहती है। फिलहाल, भाजपा का हर खेमा दिल्ली से लखनऊ तक एक ही सवाल पर टिक चुका है—अगला चेहरा कौन?


