सत्यम शिवम् सुन्दरम : नीट मुद्दे पर विफलता के बाद भी फिलहाल सरकार को कोई खतरा भले ही ना हो पर इतिहास में मोदी काल को ऐसे फैसलों के लिए महान तो नहीं कहा जाएगा

आशु भटनागर
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आशु भटनागर। नीट पेपर लीक के आक्रोश से उपजा छात्र आंदोलन अंततः कल एक बड़े आक्रोशित मार्च और पुलिस की उसी चिर परिचित कार्यशैली के दंडात्मक कार्यवाही के साथ मीडिया और सोशल मीडिया की चर्चा का प्रमुख केंद्र बन गया जिसके लिए पुलिस को जाना जाता है। सरकार किसी की भी हो पुलिस ऐसे ही काम करती है। उस पर बस फर्क ये होता है कि सत्ता पक्ष वाले पुलिस की कार्यवाही को सही बताते है विपक्ष वाते उसको गलत। पर कदाचित मुद्दा पुलिस की कार्यवाही से अधिक एक के बाद एक चुनाव जीते जा रही भाजपा के नीति निर्धारकों ओर खास तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जिद का है। ये जिद पहले भी कई बार दिखाई दी है कि जो प्रधानमंत्री ने कह दिया वही होना है वह बात अलग है कि जब-जब सड़कों पर भीड़ में अपना रूप दिखाया है तो यही प्रधानमंत्री झुकने की जगह यू टर्न लेते नजर आते हैं ।

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दरअसल समस्या किसी भी मांग में संवाद से हटने की है । बीते 12-15 वर्षों में मोदी जी को लेकर संवाद न करने की जो बात धीमे स्वर में उठती थी वह अब स्थापित हो चुकी है। मोदी जी अपने तंत्र के अनुसार मन की बात करते हैं इसीलिए उन्होंने यूजीसी में हो रहे प्रदर्शन पर भी कोई सुध नहीं ली, छात्रों के मसले पर किसी भी सत्ता का ऐसा अहंकार अक्सर सत्ताये को बदल देता है। मोदी जी का भाग्य प्रबल था, समय रहते कोर्ट का फैसला आया इसके बाद वह आंदोलन दब गया किंतु इसी बीच नीट के पेपर लीक का मामला सामने आ गया और मोदी सरकार इस बार भी भाग्य के सहारे बैठकर यह सोचने लगी की देर सवेर यह भी हट जाएंगे । बंगाल की जीत से उत्साहित सरकार का पूरा ध्यान मानसून सत्र में अपने बिल पास करने का था जिसमें परिसीमन बिल के जरिए भाजपा स्वयं को अगले 20 सालों के लिए सुरक्षित करना चाहती है। किंतु वह भूल गई की जंतर मंतर पर बैठे छात्र भले ही संख्या में कम हो सरकार के कहने पर मैन स्ट्रीम मीडिया में उनकी विजिबिलिटी ना के बराबर रहे पर फिर भी दुनिया में सब कुछ भाग्य के सहारे नहीं चलता।

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मेरे मोदी सरकार की विदाई को लेकर कह गए एक वक्तव्य पर आपत्ति करते हुए मेरे एक सहयोगी मित्र ने कहा कि मोदी सरकार क्यों जाएगी, वह एक के बाद एक चुनाव जीती जा रही है ऐसे में तुम्हारा यह कहना भ्रम है किंतु मोदी सरकार की तरह वह भी यह भूल रहे हैं कि जब किसी भी सत्ता के प्रमुख को यह लगने लगता है कि यह आम लोग क्या कर लेंगे कुछ दिन रोयेंगे पीटेंगे, भूल जाएंगे तो यह उसकी गलतफहमी होती है। आंदोलन कोई सा भी हो लोगों का आक्रोश पाइल -अप हो रहा है। चुनाव की जीत समस्याओं पर आपकी अनुपस्थिति का एकमात्र मापदंड नहीं हो सकता है यह भी सत्य है कि सोमवार को इस प्रदर्शन में मानसून सत्र के शुरू होने के साथ ही राजनीतिक दलों के समर्थक भी भरपूर मात्रा में थे, इसमें प्रमुख रूप से भीम आर्मी, आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता बहुत मात्रा में थे। संभव है यही लगातार अराजकता भी फैला रहे थे, किंतु इससे उन छात्रों की मांग और उन छात्रों के आक्रोश को कम नहीं किया जा सकता जो बीते कई हफ्तों से जंतर मंतर पर आकर अपनी बात कहने का प्रयास कर रहे थे और कल आक्रोशित होकर संसद तक जाने की कोशिश कर रहे थे।

प्रश्न यह भी नहीं है कि आक्रोश के बाद भाजपा के बड़े नेता जेपी नड्डा क्यों छात्रों से बात करने पहुंच गए प्रश्न यह है कि आखिर यह सरकार किसी भी मामले पर उठने आक्रोश में संवाद करने की पहल से क्यों बचना चाहती है? क्यों यह किसी घाव को कोढ़ बनने तक बन्ने का इंतज़ार करती है और बाद में जुते और प्याज दोनों खाने वाली कहावत को चरितार्थ कर कदम पीछे खींचती है।

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जब मैं लेख को लिख रहा हूं तो टीवी पर यह समाचार आ रहा है कि कन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा छात्रों से अस्पताल में मिल रहे हैं। साथ ही सरकार के सूत्रों से कहा जा रहा है कि जल्द ही आंदोलन को लीड कर रही सीजीपी के लोगों के साथ दूसरे चरण की वार्ता की जाएगी। निश्चित तौर पर यह सब छात्रो की मांग पर कम, मानसून सत्र के पहले दो दिन खराब होने से उपजी निराशा के बाद फ्लोर मैनेजमेंट ठीक करने की कोशिश के तहत है।

किंतु क्या यह सब सरकार के फ्लोर मैनेजमेंट से लेकर रणनीतिकारों का फेलियर नहीं है क्या सरकार आम अपने ही समर्थकों को विपक्ष की गोदी में बैठने का मौका नहीं देती है और जब दे देती है तो फिर अपने ही समर्थको विपक्ष के साथ दिखाकर उनकी मांगों को देश विरोधी साबित करने का असफल षड्यंत्र नहीं करती है और जब यही सब सरकार के कंट्रोल से बाहर हो जाता है तो फिर घुटने टेक कर माफी मांगने का नाटक नहीं करती है।

सवाल यह है कि जिस भरोसे को तीन बार से ज्यादा आम जनता ने मोदी सरकार को दिया है वह उस पर बार-बार खरी उतरने की कोशिश क्यों नहीं कर रही है? कब तक वो ऐसे तुगलगी फैसले लेती रहेगी ?
फिलहाल सरकार को कोई खतरा भले ही ना हो किंतु देर सवेर यह सब भाजपा नीत मोदी सरकार की विफलताओं और असफलताओं में रिकॉर्ड हो रहा है और इतिहास में मोदी काल को ऐसे फैसलों के लिए महान तो नहीं कहा जाएगा।

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आशु भटनागर बीते 15 वर्षो से राजनतिक विश्लेषक के तोर पर सक्रिय हैं साथ ही दिल्ली एनसीआर की स्थानीय राजनीति को कवर करते रहे है I वर्तमान मे एनसीआर खबर के संपादक है I उनको आप एनसीआर खबर के prime time पर भी चर्चा मे सुन सकते है I Twitter : https://twitter.com/ashubhatnaagar हम आपके भरोसे ही स्वतंत्र ओर निर्भीक ओर दबाबमुक्त पत्रकारिता करते है I इसको जारी रखने के लिए हमे आपका सहयोग ज़रूरी है I एनसीआर खबर पर समाचार और विज्ञापन के लिए हमे संपर्क करे । हमारे लेख/समाचार ऐसे ही सीधे आपके व्हाट्सएप पर प्राप्त करने के लिए वार्षिक मूल्य(रु999) हमे 9654531723 पर PayTM/ GogglePay /PhonePe या फिर UPI : ashu.319@oksbi के जरिये देकर उसकी डिटेल हमे व्हाट्सएप अवश्य करे