आशु भटनागर। सितंबर 2026 में जहाँ एक और दिग्गज फोन कम्पनी एप्पल(Apple) ने अपने नए iPhone 18 Pro सीरीज और कंपनी के पहले फोल्डेबल फोन iPhone Duo के आधिकारिक तौर पर लॉन्च के बाद इनको लेकर देश भर में जबरदस्त दीवानगी दिख रही है, लोग लम्बी लम्बी लाइनों में खड़े दिखाई दे रहे है वहीं दूसरी और एंड्रॉइड (Android) ओएस पर अपने फोल्ड फ़ोन बेच रही सैमसंग(SamSung) को लेकर एक विवाद सामने आया है जो सैमसंग समेत लगभग सभी टेक कम्पनियों के उपभोक्ता-विरोधी रवैये और छिपी हुई शर्तों (Hidden Terms) की कड़वी सच्चाई को उजागर करता है। जिससे पता चलता है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम किस तरह इन टेक कम्पनियों के मकड़जाल में फंस चुके है। पीड़ित ने इसको लेकर मीडिया में शिकायत की है और जल्द ही इसे लेकर कानूनी रास्ते से उच्चतम स्तर तक ले जाने का दावा किया है।
क्या है मामला?
ताजा मामला वरिष्ठ पत्रकार और पीड़ित विवेक अवस्थी से जुड़ा है, जिन्होंने सैमसंग के सबसे महंगे फ्लैगशिप फोन के लिए ₹25,999 का “व्यापक सुरक्षा बीमा” (Comprehensive Protection Insurance) खरीदा था। जब उनका हैंडसेट दुर्घटनावश क्षतिग्रस्त हो गया, तो उन्होंने नियमानुसार बीमा क्लेम किया। लेकिन सैमसंग की ओर से जो जवाब मिला, उसने उपभोक्ता अधिकारों की धज्जियां उड़ाकर रख दीं। क्लेम प्रोसेस करने के लिए उनसे “फाइल शुल्क” के नाम पर ₹15,999 अतिरिक्त देने को कहा गया।
इस पूरी प्रक्रिया पर नजर डालें तो फोन की मूल कीमत के अलावा, केवल बीमा और दावे के नाम पर ग्राहक की जेब से ₹41,998 निकाल लिए गए! पीड़ित वरिष्ठ पत्रकार विवेक अवस्थी ने अपनी पीड़ा और आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा:
“मैंने सैमसंग की व्यापक सुरक्षा बीमा के लिए ₹25,999 का भुगतान किया था। हैंडसेट क्षतिग्रस्त होने पर जब मैंने बीमा का इस्तेमाल किया, तो मुझे ‘फाइल शुल्क’ के रूप में ₹15,999 और देने के लिए मजबूर किया गया। मेरे पास भुगतान के रिकॉर्ड, बीमा दस्तावेज़ और दावे से संबंधित सभी संचार मौजूद हैं। मैं अपने साथी भारतीयों से वादा करता हूँ कि मैं इस मामले को हर संभव कानूनी रास्ते से उच्चतम स्तर तक ले जाऊँगा। यदि आवश्यक हुआ, तो कानूनी कार्रवाई भी एक विकल्प होगा। यह अब केवल ₹15,999 का मामला नहीं है; यह इस बारे में है कि क्या सुरक्षा के लिए भुगतान करने वाले भारतीय उपभोक्ता को वास्तव में सुरक्षा मिलती है—या इसके बजाय उसे लूटा जाता है। सैमसंग को जवाब देना होगा।”
नैतिकता पर हावी लालच – ₹25,999 का बीमा और फिर ₹15,999 का ‘फाइल शुल्क’ लूट नहीं तो क्या!

1996 में जब मेक इन इंडिया जैसी अवधारणाओं की दूर-दूर तक चर्चा नहीं थी, तब उत्तर प्रदेश सरकार की उदारता और कृपा से दक्षिण कोरियाई कंपनी सैमसंग को नोएडा में भूमि और अन्य प्रशासनिक सहायता मिली थी। भारतीय जमीन और भारतीय उपभोक्ताओं के दम पर सैमसंग ने देश के घरेलू उपकरणों से लेकर मोबाइल बाजार पर तेजी से कब्जा जमाया। 2018 में मेक इन इंडिया के दौर में प्रीमियम स्मार्टफोन सेगमेंट में अपने फोल्ड और फ्लिप डिवाइसों के दम पर सैमसंग ने एप्पल के आईफोन को सीधी टक्कर दी और 16% से 17.6% बाजार हिस्सेदारी (Market Share) के साथ भारत का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन ब्रांड बना हुआ है।
लेकिन, जिस भारतीय बाजार ने सैमसंग को फर्श से अर्श पर पहुंचाया, क्या वही सैमसंग कॉर्पोरेट लालच के कारण आज अपने भारतीय ग्राहकों के भरोसे का सौदा कर रही है?
सैमसंग का दावा है कि उसकी ‘व्यापक सुरक्षा योजना’ भौतिक, आकस्मिक और तरल (Liquid) क्षति से सुरक्षा प्रदान करती है। लेकिन सवाल यह उठता है कि यदि ₹25,999 चुकाने के बाद भी क्लेम के समय ग्राहक से ₹15,999 (जो कि कई मिड-रेंज स्मार्टफोन्स की कुल कीमत के बराबर है) और मांगे जाते हैं, तो फिर इसे “व्यापक सुरक्षा” (Comprehensive Protection) कहना ग्राहकों के साथ धोखा नहीं तो और क्या है?
यहाँ सबसे अहम सवाल पारदर्शिता का है
- क्या खरीदारी के समय ग्राहक को स्पष्ट रूप से बताया गया था कि दुर्घटना के समय उससे ₹15,999 की भारी-भरकम राशि अतिरिक्त वसूली जाएगी?
- यदि ₹25,999 का प्रीमियम लेने के बाद भी ग्राहक को क्लेम के समय दोबारा बड़ी रकम चुकानी पड़े, तो ‘बीमा’ का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है?
अक्सर कंपनियां ‘नियम व शर्तों’ (Terms & Conditions) के बारीक अक्षरों के पीछे छिपकर उपभोक्ताओं का शोषण करती हैं। प्रीमियम सेगमेंट के उपभोक्ता इस उम्मीद में भारी भरकम राशि का भुगतान करते हैं कि संकट के समय उन्हें परेशानी मुक्त सेवा मिलेगी, पर उनको मिलता है कम्पनी से नया ज्ञान और नया वित्तीय झटका।
आखिर उपभोक्ता क्या करे?
जब एक वरिष्ठ पत्रकार, जिसके पास सभी दस्तावेज, भुगतान रिकॉर्ड और लिखित संचार मौजूद हैं, को अपने जायज हक के लिए इस तरह संघर्ष करना पड़ रहा है, तो सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आम भारतीय उपभोक्ताओं के साथ क्या होता होगा? कितने ऐसे भारतीय ग्राहक होंगे जिन्होंने मजबूरी में या जानकारी के अभाव में यह ‘फाइल शुल्क’ चुका दिया होगा?
सैमसंग जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को यह समझना होगा कि भारत सिर्फ एक ‘बिक्री का बाजार’ नहीं है, बल्कि यहाँ के उपभोक्ताओं के पास अधिकार भी हैं। उत्तर प्रदेश सरकार और भारत सरकार के सहयोग से अपनी जड़ें मजबूत करने वाली कंपनी अगर अपने ग्राहकों के साथ ऐसी पारदर्शिता-हीन नीतियां अपनाएगी, तो उसकी साख का गिरना तय है।
यह मामला केवल ₹15,999 का नहीं है; यह भारतीय उपभोक्ता के स्वाभिमान, पारदर्शिता के अधिकार और कॉर्पोरेट जवाबदेही का है। सैमसंग को अपनी इन अस्पष्ट नीतियों पर भारतीय जनता के सामने स्थिति स्पष्ट करनी होगी। यदि कंपनियां खुद अपनी नैतिकता नहीं सुधारती हैं, तो सरकारों को उपभोक्ता अदालतों और कानूनी चाबुक के जरिए उन्हें जवाबदेह बनाने का समय आ गया है।




