व्यंग: कॉपी-पेस्ट और सनसनी के दौर में कैसे बचेंगे हिंदी पत्रकार और पत्रकारिता? वरिष्ठ पत्रकार राजेश बैरागी ने क्यूँ सुना दी एनसीआर खबर के संपादक आशु भटनागर को खरी-खरी!

आशु भटनागर
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आशु भटनागर। E 20 वाले गड़ गढ़ मंत्री की कृपा से गाड़ी सर्विस सेंटर भेजनी पड़ी है तो शनिवार को घर में आराम कर रहे थे। अचानक दरवाजे पर घंटी बजी तो देखा कि साथी पत्रकार और नेकदृष्टि के संपादक राजेश बैरागी जी आए है। हमने कहा आइए गुरुदेव, हम धन्य हुए, आज ऑफिस की जगह आप घर आ गए । बैरागी जी बिना कुछ सुने ही बोले कि तुम्हे पता भी है कि हिंदी पत्रकारों और हिंदी पत्रकारिता की क्या दुर्दशा हो रही है । हम समझ गए बैरागी जी आज चाय नहीं पीने नहीं आये है, हमने कहा चलो नीचे क्लब में चलते हैं, वही बैठेंगे। साथ में दिवाली की बची हुई अंतिम शिवाज रीगल की बोतल भी ले ली । पत्रकारों का दो पैक के बाद ही दर्द कहना और सुनना ही अच्छा लगता है ।

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खैर हम नीचे क्लब पहुंचे तो बोले अब बताइए क्या आदेश है आपका? आमलेट के पीस को चबाते हुए बोले आदेश का समय गया, उसको छोडो तुम्हें पता है कि हमारे यहां हिंदी के पत्रकारों में आप कुछ नया करने की हिम्मत नहीं बची है। हमने कहा राम राम! ये क्या कह रहे है आप, हिंदी दिवस पर कई लेख लिखे जा रहे है कई जगह हिंदी पत्रकारों और फोटोग्राफरों को सम्मानित किया जा रहा है, हमारे ग्रुप के अलावा भी कई पत्रकार आपसे प्रेरणा लेते हुए दूर दराज के राज्यों में जाकर अपने यात्रा वृतांत, संस्मरण, दृष्टिकोण लिखने लगे हैं इससे अधिक हिंदी पत्रकारिता का ओर क्या सम्मान होगा?

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बैरागी जी ने आंखें तैरते हुए हमें ऐसा देखा जैसे अबकी बार आमलेट की जगह हमें ही चबा जाएगे, बोले मैं हिंदी पत्रकारों के सम्मान और कॉपी पेस्ट पर नहीं, मौलिक लेखन पर बात कर रहा हूं । तुम बुलेट की रफ़्तार से किसी की भी स्टोरी को AI से लिख कर छापने वाले या ₹40 में स्टोरी खरीद के अपने नाम से देने वाले पत्रकारों की बातें मुझसे मत किया करो। उन्हें क्रोध में देख कर हमने उनका खाली पैग दुबारा भर दिया। और कहा कि प्रभु हम स्वयं आपसे कई साल से सीख रहे हैं आज तक आपके जैसा नहीं लिख पाए, कापी पेस्ट ….. अभी बात पूरी कह भी नहीं थे तो तभी गुस्से से हमें देखते हुए बोले कभी कॉपी करना भी मत, तुमने हमेशा अपनी मौलिकता से लिखा है और आगे भी इस पर कायम रहना क्योंकि दुनिया में मौलिक के सामने कापी कभी नहीं बिकती।

हमने तीसरा पैग बनाते हुए उनसे फिर कहा कि गुरु अब आपके दौर के इस जिले में अच्छे पत्रकार बचे ही कहां है। आप ही हम सब पत्रकारों को कुछ राह दिखाइए हिंदी पत्रकारिता को कैसे मजबूत किया जाए। बैरागी जी बोले कि कि हिंदी पत्रकारिता को यदि वास्तव में मजबूत करना है, तो इसके भाषाई स्तर, तकनीकी सामर्थ्य और आर्थिक स्वतंत्रता में आमूल-चूल सुधार करने की आवश्यकता है। पत्रकारिता के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए चार स्तंभों “—”भाषाई गरिमा, निष्पक्षता, डिजिटल दक्षता और आर्थिक स्वायत्तता” पर विशेष ध्यान देना होगा।

आज टीआरपी और लाइक्स की होड़ में भाषा की मूल गरिमा से समझौता किया जा रहा है। सनसनीखेज हेडलाइंस, क्लिकबेट और अत्यधिक ‘हिंग्लिश’ (हिंदी-अंग्रेजी का मिलाजुला रूप) के प्रयोग से हिंदी अपनी मौलिकता खो रही है। पत्रकारों को मानक और गौरवपूर्ण हिंदी का उपयोग करना चाहिए। इसके अलावा, विदेशी या अंग्रेजी खबरों के मशीनी (Google) अनुवाद पर आँख मूँदकर निर्भर रहने के बजाय, उन्हें हिंदी की प्रकृति, मिजाज और भारतीय संस्कृति के अनुकूल ढालकर प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

सोशल मीडिया युग में ‘सबसे पहले’ खबर देने की होड़ ने भी हिंदी पत्रकारों और पत्रकारिता की साख को सबसे बड़ा नुकसान पहुँचाया है। फेक न्यूज और अफवाहों के इस दौर में बिना जांचे-परखे खबरों को परोसने की प्रवृत्ति पर सख्त रोक लगानी होगी। केवल नेताओं के बयानों और प्रेस विज्ञप्तियों पर आधारित पत्रकारिता से आगे बढ़कर, ‘खोजी पत्रकारिता’ (Investigative Journalism) को बढ़ावा देना होगा। जमीन से जुड़ी समस्याओं और जनहित के वास्तविक मुद्दों को प्रमुखता से उठाना ही पत्रकारिता का असल धर्म है।

तकनीक आज की पत्रकारिता का सबसे बड़ा हथियार है। हिंदी पत्रकारों को केवल पारंपरिक लेखन तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें डेटा जर्नलिज्म, वीडियो एडिटिंग और आधुनिक डिजिटल टूल्स में दक्ष होना होगा। आज की युवा पीढ़ी को जोड़ने के लिए पॉडकास्ट, आकर्षक इंफोग्राफिक्स और शॉर्ट-फॉर्म वीडियो जैसे मल्टीमीडिया माध्यमों का प्रभावी उपयोग अनिवार्य हो गया है।

हमने कहा गुरु जी ये सब तो सही है पर आज के दौर पत्रकारों के साथ समस्या हिंदी लेखन से अधिक आर्थिक है, बड़े कोरपोरेट से विज्ञापन लें तो जनता की बात कैसे लिखे और जनता की बात लिखे तो विज्ञापन कैसे ले? आखिरी पैग उठाते हुए बैरागी जी बोले किसी भी स्वतंत्र पत्रकारिता की रीढ़ उसकी आर्थिक स्थिति होती है। जब तक मीडिया संस्थान विज्ञापनों और राजनीतिक दबावों से पूरी तरह मुक्त नहीं होंगे, तब तक निष्पक्ष पत्रकारिता संभव नहीं है। इसके पारदर्शी फंडिंग मॉडल और ‘सब्सक्रिप्शन-बेस्ड’ (पाठकों के आर्थिक सहयोग पर आधारित) पत्रकारिता को अपनाने की आवश्कीयकता है। जब पाठक खुद मीडिया को फंड करेंगे, तभी पत्रकारिता जनता के प्रति जवाबदेह बनेगी और हिंदी का भविष्य संवर सकेगा।

हमने कहा गुरु जी ये बात पत्रकारों के साथ साथ पाठको को भी समझनी होगी अगर वो हिंदी की स्वतंत्र पत्रकारिता को सहयोग करना नहीं सीखेंगे तब तक हिंदीदिवस के नाम पर ऐसे ही सम्मान होते रहेंगे और हम बस चर्चा करते रहगे I आपकी ये बात हिंदी पत्रकारिता से जुड़े हर एक व्यक्ति के लिए भी आत्ममंथन का अवसर है। यदि समय रहते हिंदी मीडिया ने अपनी भाषा, साख और आर्थिक मॉडल में सुधार नहीं किया, तो वैश्विक पहचान बनाने की दौड़ में वह पिछड़ सकती है। हिंदी पत्रकारिता के स्वर्णिम भविष्य के लिए अब इन ठोस कदमों को जमीन पर उतारना समय की सबसे बड़ी मांग है। इतना कह कर हम दोनों ही क्लब से बाहर निकल आये है, वैरागी जी को विदा कर अब अपनी गाडी लेने जा रहे है।

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आशु भटनागर बीते 15 वर्षो से राजनतिक विश्लेषक के तोर पर सक्रिय हैं साथ ही दिल्ली एनसीआर की स्थानीय राजनीति को कवर करते रहे है I वर्तमान मे एनसीआर खबर के संपादक है I उनको आप एनसीआर खबर के prime time पर भी चर्चा मे सुन सकते है I Twitter : https://twitter.com/ashubhatnaagar हम आपके भरोसे ही स्वतंत्र ओर निर्भीक ओर दबाबमुक्त पत्रकारिता करते है I इसको जारी रखने के लिए हमे आपका सहयोग ज़रूरी है I एनसीआर खबर पर समाचार और विज्ञापन के लिए हमे संपर्क करे । हमारे लेख/समाचार ऐसे ही सीधे आपके व्हाट्सएप पर प्राप्त करने के लिए वार्षिक मूल्य(रु999) हमे 9654531723 पर PayTM/ GogglePay /PhonePe या फिर UPI : ashu.319@oksbi के जरिये देकर उसकी डिटेल हमे व्हाट्सएप अवश्य करे