नोएडा/ग्रेटर नोएडा। उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर जिले में समाजवादी पार्टी के संगठन की मजबूती को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। शनिवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नोएडा आगमन के दौरान पार्टी द्वारा घोषित विरोध प्रदर्शन की विफलता ने सपा के स्थानीय नेतृत्व की रणनीति पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। तमाम दावों के बावजूद दोनों ही स्थानों पर कार्यकर्ताओं की उपस्थिति बेहद सीमित रही। संख्या सैकड़ा के आंकड़े को भी पार नहीं कर सकी, जिससे पार्टी के स्थानीय नेतृत्व की धरातल पर पकड़ को लेकर कार्यकर्ताओं में ही मायूसी फैल गई है।

क्या थी योजना और क्या रहा परिणाम?
मुख्यमंत्री के आगमन से पूर्व, नोएडा महानगर और नोएडा जिला इकाई द्वारा मीडिया में यह संदेश फैलाया गया था कि मुख्यमंत्री को काले झंडे दिखाए जाएंगे। नोएडा में सेक्टर-73 के पास और ग्रेटर नोएडा में जिला कार्यालय पर प्रदर्शन की तैयारी की गई थी। हालांकि, तमाम दावों के बावजूद किसी भी स्थान पर कार्यकर्ताओं की संख्या सौ के आंकड़े को भी नहीं छू सकी। ग्रेटर नोएडा में छात्र सभा के जिलाध्यक्ष मोहित नागर को कुछ समर्थकों के साथ हिरासत में जरूर लिया गया, लेकिन मुख्य प्रदर्शन पूरी तरह बेअसर साबित हुआ।
सपा नेतृत्व पर बढ़ता दबाव
बता दें कि बीते 20 वर्षों से जिले में समाजवादी पार्टी का चुनावी प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा है। दीपक विग के कार्यकाल में शहरी मतदाताओ को जोड़ने में मिली सफलता के बाद पार्टी ने युवाओं पर भरोसा जताते हुए डॉ. आश्रय गुप्ता को नोएडा महानगर और सुधीर भाटी को जिला अध्यक्ष नियुक्त किया था। पार्टी आलाकमान को उम्मीद थी कि ये युवा नेता संगठन में नई जान फूँकेंगे। हालिया जिम्स (GIMS) लाठीचार्ज मामले के बाद माना जा रहा था कि पार्टी इस मुद्दे को भुनाकर अपनी ताकत दिखाएगी, लेकिन शनिवार के घटनाक्रम ने पार्टी के अंदर ही नेतृत्व की क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आज की असफलता के बाद समाजवादी पार्टी में बीते दिनों समाजवादी व्यापार प्रकोष्ट के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप जायसवाल के सभा में कम उपस्थिति का मुद्दा भी सामने आ गया है कहा जा रहा है कि उसमे भी सपा अध्यक्ष की कमजोरी के कारण सपा से जुड़े व्यापारी ही नहीं पहुँच सके थे, उनको सुचना ही नहीं दी गयी थी तो बाकी कहाँ से आते।

टिकट की दावेदारी बनाम जमीनी हकीकत
राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की है कि जहां एक ओर नोएडा और दादरी विधानसभा सीटों के लिए ये दोनों युवा अध्यक्ष प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर संगठन को सड़क पर उतारने में उनकी विफलता ने पार्टी कार्यकर्ताओं को हताश कर दिया है।
तमाम राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि संगठन की स्थिति यही रही, तो भविष्य के चुनावों में पार्टी के लिए न केवल अपनी साख बचाना कठिन होगा, बल्कि प्रत्याशियों के लिए जमानत बचाना भी एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
क्या बदलेगी रणनीति?
पार्टी के भीतर से ही यह सवाल उठने लगा है कि क्या अखिलेश यादव ऐसे कमजोर संगठन के भरोसे इन युवाओं को चुनावी मैदान में उतारेंगे? या फिर गौतम बुद्ध नगर में फिर वही पुराना इतिहास दोहराया जाएगा, जहां सपा अपना खाता खोलने के लिए जूझती नजर आती है। फिलहाल, इस प्रदर्शन की विफलता ने पार्टी शीर्ष नेतृत्व के समक्ष जिले की संगठनात्मक संरचना पर पुनर्विचार करने का दबाव बढ़ा दिया है।



