आशु भटनागर। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के आगरा में विजयनगर कॉलोनी स्थित पैतृक आवास पर सोमवार सुबह कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया यहां तक सब सही था किंतु इसके बाद जो हुआ उसकी अपेक्षा किसी भी राजनीतिक दल से नहीं की जा सकती है। प्रदर्शनकारियों ने आवास के गेट पर कालिख पोत दी और काले पेंट से ‘ज्ञानेश कुमार गद्दार हैं’ लिख दिया। इसके बाद कुछ देर तक नारेबाजी करते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग की। पैतृक आवास में ज्ञानेश कुमार के पिता डॉ. सुबोध कुमार रहते हैं। प्रदर्शन के दौरान वह भी घर पर नहीं थे। वे इस प्रदर्शन से आहत हैं। उनका कहना है कि बेटे से अगर कोई नाराजगी है तो उनके सामने विरोध जताएं।
प्रश्न यह है कि क्या इस कृत्य को करने के बाद कांग्रेस स्वयं को देशभक्त बताना चाहती है । चुनाव आयुक्त के साथ कांग्रेस का ही टकराव के नया नहीं है। कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार के समय भी टी एन शेषन के साथ जब तनाव बढ़ा तो इस चुनाव आयुक्त संस्था को बहु सदस्य बनाने की भी परम्परा भी वहीं से शुरू हुई। अपनी राजनीती के लिए प्रशानिक अधिकारियो को निशाना बना देने वाली कांग्रेस से सवाल यह भी है कि क्या कांग्रेस ज्ञानेश कुमार को गद्दार देश से गद्दारी के तौर पर लिख रही है या फिर वो कांग्रेस के गद्दार हैं ? क्या उसे ये लगता है कि जिन ज्ञानेश कुमार को उनके शासनकाल में मौके दिए गए वहीं अब उनकी राजनीति को आगे नहीं बढ़ा रहे हैं।
यह सर्व विदित है कि कांग्रेस ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में हुए Special Intensive Revision (SIR) 2026 पर नाराज है लेकिन सच यह भी है कि ज्ञानेश कुमार ने इस SIR के जरिए मृतक डुप्लीकेट, विस्थापित वोटरों के नाम पर हो रही धाँधली को रोका है और अगर इसी वजह से कांग्रेसी वामपंथी या विपक्ष उन्हें गद्दार कह रही तो देश की राजनीति में आई गिरावट को समझा जा सकता है । कांग्रेस को ये समझना होगा कि लोकतंत्र असहमत होना चर्चा का एक मुख्य अंग है पर उसकी भी सीमाए है। प्रश्न यह होना चाहिए कि क्या किसी एक अख़बार द्वारा छापी गयी खबर के बाद चुनाव आयुक्तों में दिखी असहमति का निवारण हुआ या नहीं? चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण आ चुका है कि हर निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया है। तब भी कांग्रेस अगर इसे सडको पर उतरने का मुद्दा बना रही है तो माना यही जाएगा कि कांग्रेस जिस तरह अभी भी चुनावो में अपनी हार का वास्तिक कारण खोजने की जगह संविधानिक संस्थाओ को निशाना बनाना ही राजनीती समझ रही है उसे भारत की जनता स्वीकार नहीं कर रही है और ऐसे कृत्यों के बाद परिणाम में गिरावट ही आनी है।




